Sunday, May 31, 2020

टिद्दियो के बारे में कुछ रोचक तथ्य

एक तरफ देश कोरोना वायरस (Corona Virus) महामारी से जूझ रहा है और दूसरी तरफ, तकरीबन महामारी की शक्ल में एक और संकट आ खड़ा हुआ है. राजस्था, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पिछले कुछ दिनों से टिड्डियों के दलों ने आतंक मचा रखा है।

जानते हैं टिड्डियों के बारे में कुछ रोचक तथ्य :-

टिड्डियों को अंग्रेजी में Locusts कहा जाता है।

टिड्डियों की दुनिया भर में 10 हज़ार से ज़्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन भारत में मुख्य तौर से चार प्रजातियां रेगिस्तानी टिड्डा, प्रव्राजक टिड्डा, बम्बई टिड्डा और पेड़ वाला टिड्डा ही पाई जाती है।

जब हरे भरे घास के मैदान में रेगिस्तानी टिड्डे इकठ्ठे होते हैं तो जुंड में भयानक हो जाते हैं, और वे हर भरे घास के मैदान को साफ कर सकते हैं।

इसलिए इन्हें दुनिया का सबसे खतरनाक कीट कहा जाता है।

आसमान में उड़ते टिड्डी दलों में दस अरब टिड्डे तक हो सकते हैं।

एफएओ के मुताबिक एक वर्ग किलोमीटर में फैले दल में करीब 4 करोड़ टिड्डियां होती हैं, जो एक दिन में इतने वज़न का भोजन कर लेती हैं, जितने में 35 हज़ार लोगों का पेट भर सकता है। अगर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 2.3 किग्रा भोजन का औसत लिया जाए।

टिड्डियों का झुंड एक दिन में 13 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से करीब 200 किलोमीटर तक का रास्ता नाप सकते हैं।

टिड्डे इतनी संख्या में पेड़ों पर बैठते हैं कि उनके भार से पेड़ टूट तक सकता है।

टिड्डियां अपने वजन के बराबर भोजन खा जाती है। यानी कम से कम एक से दो ग्राम। Ex. किसी शहर में 10 लाख टिड्डियों ने हमला किया था, यानी इतनी टिड्डियां मिलकर करीब 10,000 किलोग्राम वज़न का भोजन खा जाती हैं।

माना जाता है कि ये टिड्डी दल ईरान के रास्ते पाकिस्तान से होते हुए भारत पहुंचे हैं।

एक मादा टिड्डी अपने जीवन में कम से कम तीन से चार बार अंडे देती है और एक बार में 95 से 158 अंडे तक दे सकती है।

एक टिड्डी का जीवन सामान्यतया तीन से पांच महीने का होता है।

माना जाता है कि टिड्डी दलों की तादाद और हमले बढ़ने का कारण बेमौसमी बारिश रही है।

रासायनिक उपायों में कारबैरिल को टिड्डियों के लिए सबसे असरदार माना जाता है लेकिन इसके छिड़काव से फसलों के लिए उपयोगी कीट भी नष्ट होते हैं।

Saturday, May 30, 2020

विश्व का सबसे महान वैज्ञानिक 'स्टीफन हॉकिंग'

"में अभी और जीना चाहता हूं" ये किसी और का कथन नहीं है। विश्वके महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग का है। जिसे उन्होंने अपने 70 वे जन्म दिन पर कहा था। जिसे सुनकर दुनिया एक पल के लिए अचंभित हो गयी थी। तो आयी ऐ आज हम ऐसे महान वैज्ञानिक की बात करते हैं।

स्टीफन हॉकिंग का जन्म :-

स्टीफन हॉकिंग का जन्म ८ जनवरी १९४२ को ऑक्सफोर्ड में फ्रैंक और इसाबेल एलेन हॉकिंग के घर हुआ था। स्टीफन हॉकिंग और गलीलियो गलीलेइ की जन्म तिथि एक ही है।

बचपन से ही हॉकिंग बड़े बुद्धि मान थे। उनके वक्तव्य ऐसे थे जो लोगो को चौका देते थे। बचपन में लोगो उन्हें आइंस्टीन कहके बुलाते थे। जब हॉकिंग पैदा होने वाले थे तब परिवार लंडन में था। लेकिन दूसरे युद्ध के कारण वो ओक्सफ़ोर्ड में आकर बस गये। स्टीफन जब आठ वर्ष के थे तब उनके परिवार वाले सेंट अल्बान में आकर रहने लगे।

स्टीफन हॉकिंग की शिक्षा :-

सेंट अल्बान के ही एक स्कूल में स्टीफन का दाखिला करवा दिया गया। उनके पिता उन्हें डॉक्टर बनना चाहते थे। लेकिन उनको गणित विषय में रुचि थी। अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद स्टीफन ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और यहां पर इन्होंने भौतिकी (Physics) विषय पर अध्ययन किया।

कहा जाता है कि स्टीफन को गणित विषय में रुचि थी और वो इसी विषय में अपनी पढ़ाई करना चाहते थे. लेकिन उस वक्त ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में ये विषय नहीं हुआ करता था। जिसके कारण उन्हें भौतिकी विषय को चुनना पड़ा।

भौतिकी विषय में प्रथम श्रेणी में डिग्री हासिल करने बाद इन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अपनी आगे की पढ़ाई की। साल 1962 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में डिपार्टमेंट ऑफ एप्लाइड मैथेमैटिक्स एंड थ्योरिटिकल फिजिकल (डीएएमटीपी) में इन्होंने ब्रह्माण्ड विज्ञान पर अनुसंधान किया।

साल 1963 में खराब हुई सेहत :-

जब स्टीफन हॉकिंग 21 साल के हुए थे तब छुट्टी मनाने घर पर आए थे। जब वह सीढ़ी उतर रहे थे तब उनको बेहोसी का अहसास हुआ और वह सीढ़ी से गिर गए। उन्हें तुरंत डॉक्टर के पास ले जाया गया। शुरू में तो सबको लगा ये कमजोरी के कारण हुआ ऐसा लगा। लेकिन बार बार ऐसा होने लगा तब उनको बड़े डॉक्टरो के पास ले जाया गया। और वहा पता चला कि वो अंजान और कभी ठीक न होने वाली बीमारी से ग्रस्त है। जिसका नाम है एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (amyotrophic lateral sclerosis (ALS) )नामक बीमारी है। इस बीमारी के कारण शरीर के हिस्से धीरे-धीरे कार्य करना बंद कर देते हैं और इस बीमारी का कोई भी इलाज नहीं है।

इस लिए डॉक्टर ने कहा की हॉकिंग मात्र दो साल के मेहमान है इसे ज्यादा वो नही जी सकते हैं लेकिन हॉकिग ने अपनी इच्छा शक्ति पे पकड़ बना रखी थी और कहा में 10..20….30 नहीं पूरे पचास साल जीऊंगा और आज दुनिया इसकी साक्षी है कि जो हॉकिंग ने कहा था वो कर दिखाया। जिस वक्त स्टीफन को इस बीमारी का पता चला था उस वक्त वो कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई कर रहे थे। लेकिन उन्होंने अपनी इस बीमारी को अपने सपनों के बीच नहीं आने दिया। बीमार होने के बावजूद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई को पूरा किया और साल 1965 में उन्होंने अपनी पीएचडी की डिग्री हासिल की।

स्टीफन हॉकिंग की पत्नी

जिस साल स्टीफन को अपनी बीमारी के बारे में पता चला उसी साल उन्होंने अपनी प्रेमिका जेन वाइल्ड से साथ विवाह किया। हॉकिंग के इस बुरे वक्त में जेन ने उनका साथ दिया और साल 1965 में इन्होंने शादी कर ली। उस उनका दाहिना हिंसा पूरी तरह से खराब हो चुका था और वो स्टिक के सहारे चलते थे। जेन और हॉंकिग के कुल तीन बच्चे थे और इनके नाम रॉबर्ट, लुसी और तीमुथियस है। हॉकिंग की ये शादी 30 सालों तक चली थी और साल 1995 में जेन और हॉकिंग ने तलाक ले लिया था। जेन का तलाक लेने का कारण था की वो एक धार्मिक स्त्री थी जबकि हॉकिंग हर वख्त भगवान के अस्तित्व को चुनोती देते थे। जिस के कारण उनकी काफी आलोचना भी हुई। लेकिन उन पर ध्यान दिये बिना हॉकिंग अपनी खोजो पे आगे बढ़ते गए।

तलाक लेने के बाद हॉकिंग ने ऐलेन मेसन(Elaine Mason) से विवाह कर लिया था और साल 1995 में हुई ये शादी साल 2016 तक ही चली थी।

स्टीफन हॉकिंग का करियर

कैम्ब्रिज से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद भी हॉकिंग इस कॉलेज से जुड़े रहे और इन्होंने एक शोधकर्ता के रूप में यहां कार्य किया। इन्होंने साल 1972 में डीएएमटीपी में बतौर एक सहायक शोधकर्ता अपनी सेवाएं दी और इसी दौरान इन्होंने अपनी पहली अकादमिक पुस्तक, ‘द लाज स्केल स्ट्रक्चर ऑफ स्पेस-टाइम’ लिखी थी। यहां पर कुछ समय तक कार्य करने के बाद साल 1974 में इन्हें रॉयल सोसायटी (फैलोशिप) में शामिल किया गया। जिसके बाद इन्होंने साल 1975 में डीएएमटीपी में बतौर गुरुत्वाकर्षण भौतिकी रीडर के तौर पर भी कार्य किया और साल 1977 में गुरुत्वाकर्षण भौतिकी के प्रोफेसर के रूप में भी यहां पर अपनी सेवाएं दी।वहीं इनके कार्य को देखते हुए साल 1979 में इन्हें कैम्ब्रिज में गणित के लुकासियन प्रोफेसर (Lucasian Professor) नियुक्त किया गया था, जो कि दुनिया में सबसे प्रसिद्ध अकादमी पद है और इस पद पर इन्होंने साल 2006 तक कार्य किया।

स्टीफन हॉकिंग द्वारा किए गए कार्य

  • प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग ने ब्रह्मांड को नियंत्रित करने वाले बुनियादी लॉ पर कई शोध किए हैं। हॉकिंग ने अपने साथी रोजर पेनरोस के साथ मिलकर एक शोध किया था और दुनिया को बताया था अंतरिक्ष और समय, ब्रह्मांड के जन्म के साथ शुरू हुए हैं और ब्लैक होल के भीतर समाप्त होंगे।
  • आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी और क्वांटम थ्योरी का प्रयोग करके, हॉकिंग ने ये भी निर्धारित किया कि ब्लैक होल पूरी तरह से शांत नहीं हैं बल्कि उत्सर्जन विकिरण (emit radiation) करता है।
  • इसके अलावा हॉकिंग ने ये भी प्रस्ताव किया था कि ब्रह्मांड की कोई सीमा नहीं है और विज्ञान की मदद से ये भी पता किया जा सकता है कि ब्रह्माण्ड की शुरूआत कब हुई थी और कैसे हुई थी।

हॉकिंग द्वारा लिखी गई सबसे पहली किताब का नाम ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ था। ये किताब बिग बैंग और ब्लैक होल के विषय पर आधारित थी और साल 1988 में प्रकाशित हुई ये किताब 40 भाषाओं में उपलब्ध है। जिसने दुनिया भरके विज्ञान जगत में तहलका मचा दिया था।

स्टीफन हॉकिंग को कई पुरस्कारो से भी समानित किया गया है। उन्होंने कई किताबें भी लिखी है।

स्टीफन हॉकिंग के जीवन पर बनीं फिल्म

साल 2014 में इन पर एक मूवी बनाई गई, जिसका नाम नाम “द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग’ हैं। इस फिल्म में उनकी जिंदगी के संघर्ष को दिखाया गया था और बताया गया था कि किस तरह से इन्होंने अपने सपनों के पूरा किया था।

स्टीफन हॉकिंग की मृत्यु

हॉकिंग लंबे समय से बीमार चल रहे थे। एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस बीमारी के कारण इन्होंने अपने जीवन के लगभग 53 साल व्हील चेयर पर बताए हैं। वहीं 14 मार्च को इस महान वैज्ञानिक ने अपनी अंतिम सांस इग्लैंड में ली है और इस दुनिया से विदाई ले ली। लेकिन वैज्ञानिक में इनके द्वारा दिए गए योगदानों को कभी भी भुला नहीं जा सकेगा।

स्टीफन हॉकिंग कहा करते थे कि अगर आप हमेशा नाराज़ रहेंगे एवं अपने आपको कोसते ही रहेंगे तो किसी के पास आपके लिए टाइम नहीं होगा।


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Thursday, May 28, 2020

उनाकोटी में बनी 99 लाख 99 हजार 999 मूर्तियों का रहस्य क्या है?

भारत में ऐसी कई रहस्यमय जगहें हैं, जिनके सीने में छुपे राज को आज तक कोई भी नहीं जान पाया है। एक ऐसी ही जगह है त्रिपुरा की राजधानी अगरतल्ला से लगभग 145 किलोमीटर दूर, जिसे उनाकोटी के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि यहां कुल 99 लाख 99 हजार 999 पत्थर की मूर्तियां हैं, जिनके रहस्यों को आज तक कोई भी सुलझा नहीं पाया है। जैसे कि- ये मूर्तियां किसने बनाई, कब बनाई और क्यों बनाई और सबसे जरूरी कि एक करोड़ में एक कम ही क्यों? इसके पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं, जो हैरान करने वाली हैं।

इन रहस्यमय मूर्तियों के कारण ही इस जगह का नाम उनाकोटी पड़ा है, जिसका अर्थ होता है करोड़ में एक कम। इस जगह को पूर्वोत्तर भारत के सबसे बड़े रहस्यों में से एक माना जाता है। कई सालों तक तो इस जगह के बारे में किसी को पता ही नहीं था। अभी भी बहुत कम लोग ही इसके बारे में जानते हैं।

उनाकोटी को रहस्यों से भरी जगह इसलिए कहते हैं, क्योंकि एक पहाड़ी इलाका है जो दूर-दूर तक घने जंगलों और दलदली इलाकों से भरा है। अब ऐसे में जंगल के बीच में लाखों मूर्तियों का निर्माण कैसे किया गया होगा, क्योंकि इसमें तो सालों लग जाते और पहले तो इस इलाके के आसपास कोई रहता भी नहीं था। यह लंबे समय से शोध का विषय बना हुआ है।

यहां पत्थरों पर उकेरी गई और पत्थरों को काटकर बनाई गई हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों के बारे में एक पौराणिक कथा बहुत प्रचलित है।

मान्यता है कि एक बार भगवान शिव समेत एक करोड़ देवी-देवता कहीं जा रहे थे। रात हो जाने की वजह से बाकी के देवी-देवताओं ने शिवजी से उनाकोटी में रूककर विश्राम करने को कहा। शिवजी मान गए, लेकिन साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि सूर्योदय से पहले ही सभी को यह स्थान छोड़ देना होगा। लेकिन सूर्योदय के समय केवल भगवान शिव ही जग पाए, बाकी के सारे देवी-देवता सो रहे थे। यह देखकर भगवान शिव क्रोधित हो गए और श्राप देकर सभी को पत्थर का बना दिया। इसी वजह से यहां 99 लाख 99 हजार 999 मूर्तियां हैं, यानी एक करोड़ से एक कम (भगवान शिव को छोड़कर)।

इन मूर्तियों के निर्माण को लेकर एक और कहानी प्रचलन में है।

कहते हैं कि कालू नाम का एक शिल्पकार था, जो भगवान शिव और माता पार्वती के साथ कैलाश पर्वत जाना चाहता था, लेकिन यह संभव नहीं था। हालांकि शिल्पकार की जिद के कारण भगवान शिव ने उससे कहा कि अगर एक रात में एक करोड़ देवी-देवताओं की मूर्तियां बना दोगे तो वो उसे अपने साथ कैलाश ले जाएंगे। यह सुनते ही शिल्पकार जी-जान से अपने काम में लग गया और तेजी से एक-एक कर मूर्तियों का निर्माण करने लगा। उसने पूरी रात मूर्तियों का निर्माण किया, लेकिन जब सुबह गिनती की गई तो पता चला कि उसमें एक मूर्ति कम है। इस वजह से उस शिल्पकार को भगवान शिव अपने साथ नहीं ले गए। माना जाता है कि इसी वजह से इस जगह का नाम 'उनाकोटी' पड़ा।

Wednesday, May 27, 2020

दुनिया का सबसे अमीर घर कौनसा!!

भारत के राष्ट्रपति भवन से अधिक महंगा और ऐश्वर्यपूर्ण घर वर्तमान विश्व में और कोई दूसरा नहीं है।

राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली में स्थित है और भारत के राष्ट्रपति का आधिकारिक आवास है। यह भारत के सबसे प्रतिष्ठित स्मारकों में से एक है। इसमें उद्यान, संग्रहालय, समारोह कक्ष, बड़ा खुला स्थान, अंगरक्षकों एवं कर्मचारियों आदि के निवास भी शामिल हैं। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह देश में राष्ट्र प्रमुख का सबसे बड़ा निवास स्थान है। राष्ट्रपति भवन के सबसे प्रमुख और खास पहलू है उसका गुंबद जो इसकी संरचना पर उपर से रखा गया है। इससे जुड़ी हुई कुछ मुख्य जानकारियां प्रस्तुत है:-

1. राष्ट्रपति भवन जो राष्ट्रपति निवास के नाम से भी जाना जाता है, इटली के रोम स्थित क्यूरनल पैलेस के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निवास स्थान है।

2. इसे तैयार होने में पूरे 17 वर्षों का समय लगा था इसका निर्माण कार्य 1912 में शुरु हुआ था और 1929 में यह बन कर तैयार हुआ था। इसके निर्माण कार्य में करीब 29,000 लोग लगाए गए थे।

3. इसमें राष्ट्रपति कार्यालय, अतिथि कक्षों और कर्मचारी कक्षों समेत 340 कमरे हैं जो 4 तलों पर स्थित है।

4. इसमें 750 कर्मचारी काम करते हैं जिनमें से 245 राष्ट्रपति के सचिवालय में कार्यरत हैं।

5. इसे 700 मिलियन इंटों और 3 मिलियन घन फीट पत्थरों का इस्तेमाल कर बनाया गया है।

6. इसे रायसीना हिल पर बनाया गया है जिसे (रायसिनी और माल्चा) दो गांवों के नाम पर नाम दिया गया था और इस महल के निर्माण के लिए इन गांवों को हटा दिया गया था। इसका निर्माण वास्तुकार सर एडविन लैंडसीर लुटियन द्वारा किया गया था।

7. स्वतंत्रता से पहले इसे वायसरॉय हाउस के नाम से जाना जाता था और यह भारत का सबसे बड़ा निवास स्थान था।

8. प्रत्येक वर्ष फरवरी के महीने में राष्ट्रपति भवन के पीछे बने मुगल गार्डन को उद्यानोत्सव नाम के त्योहार के दौरान जनता के लिए खोला जाता है।

9. इसमें अलग–अलग आकार वाले कई उद्यान हैं जैसे आयता कार, लंबा और गोलाकार। सबसे मनमोहक दृश्य गोलाकार उद्यान का हैं। जिसमें सीढ़ीदार कटोरानुमा फूलों के खेतों में अलग–अलग रंगों में फूल खिले हुए हैं।

10. गौतम बुद्ध की प्रतिमा जो चौथी–पांचवीं शताब्दी के आस–पास गुप्त काल के दौरान कला एवं संस्कृति के स्वर्ण युग से सम्बंधितहै। यह प्रतिमा राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल के पीछे है।

11. गौतम बुद्ध की प्रतिमा जिस स्थान पर रखी गई है उसकी उंचाई इंडिया गेट के बराबर है।

12. एक और रोचक तथ्य यह है कि राष्ट्रपति भवन के बैंक्वेट हॉल में एक साथ 104 अतिथि बैठ सकते हैं। इतना ही नहीं इसमें न सिर्फ संगीतकारों के लिए गुप्त दीर्घा है लेकिन इसमें प्रकाश की व्यवस्था भी अद्भुत है क्योंकि ये भूतपूर्व राष्ट्रपतियों की तस्वीरों पर लगी है, जो खानसामों के लिए कब परोसना है, कब नहीं परोसना है और कब कक्ष की साफ– सफाई करनी है, का संकेत देती है।

13. राष्ट्रपति भवन के उपहार संग्रहालय में किंग जॉर्ज पंचम की चांदी की 640 किलोग्राम की कुर्सी रखी है। इस कुर्सी पर दिल्ली दरबार में वे 1911 में बैठे थे।

14. राष्ट्रपति भवन के मार्बल हॉल में वायसरॉय और ब्रिटिश राजपरिवार के कुछ दुर्लभ चित्र और मूर्तियां रखी हैं। अद्भुत बात यह है कि इसमें हमारे वर्तमान राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी की सजीव मोम की प्रतिमा रखी है। इस प्रतिमा को आसनसोल के कलाकार ने बनाया था।

15. राष्ट्रपति भवन का अशोका हॉल– इसमें मंत्रियों के शपथग्रहण आदि जैसे समारोह होते हैं। साथ ही इसमें फारस के कजर शासक फतेह अली शाह के अद्भुत चित्र रखे गए हैं। इतावली चित्रकार कोलोन्नेलो द्वारा जंगल विषय पर बनाए गए कुछ चित्र भी रखे हुए हैं।

16. एक और आश्चर्यजनक बात यह है कि राष्ट्रपति भवन में बच्चों के लिए दो दीर्घाएं हैं। एक में बच्चों के काम यानि 'बच्चों द्वारा' किए गए काम को प्रदर्शित किया गया है और दूसरे में बच्चों की रूचि यानि 'बच्चों के लिए' का अलग–अलग वस्तुओं का प्रदर्शन किया गया है।

17. सबसे अद्भुत राष्ट्रपति भवन का विज्ञान एवं नवाचार गैलरी है। इसमें एक रोबोट कुत्ता है। इसका नाम क्लम्सी है जो बिल्कुल असली कुत्ते जैसा दिखता है।

18. "अ टॉकिंग वॉल" और "ए प्लैनेट वॉल" दिलचस्प ऑडियो-वीडियो प्रदर्शनी है जो बच्चों में रूचि पैदा करता है।

19. एक आभासी तबला जो आगंतुकों को बजाने और बिना छुए उसकी ध्वनि को सुनने में सक्षम बनाता है, आदि।

20. प्रत्येक शनिवार को सुबह 10 बजे से 30 मिनटों तक चलने वाला 'चेंज ऑफ गार्ड' समारोह आयोजित किया जाता है और यह जनता के लिए भी खुला होता है यानि राष्ट्रपति भवन में इस समारोह को देखने के लिए सिर्फ आपको अपना फोटो पहचानपत्र दिखाना होता है।

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Monday, May 25, 2020

टेस्ला मोटर्स के कुछ दिमाग हिला देने वाले तथ्य!!

  • टेस्ला के सभी कार डिजाइन ओपन सोर्स हैं। उन्होंने इलेक्ट्रिक कार प्रौद्योगिकी की उन्नति के लिए 2014 में अपने पेटेंट जारी करना शुरू किया।
  • टेस्ला मॉडल 3 $ 35,000 में उपलब्ध है।
  • टेस्ला मोटर्स स्टॉक (TSLA) NASDAQ पर सबसे छोटा स्टॉक है। कुछ निवेशक इसे एक प्रचार समझते हैं, जबकि अन्य का मानना ​​है कि यह नई क्रांति होगी।
  • गिगाफैक्टरी एक साल में 500,000 इलेक्ट्रिक कारों का उत्पादन करने में सक्षम है।
  • दुनिया भर में 9,184 सुपरचार्जर के साथ 1,191 टेस्ला इलेक्ट्रिक चार्जर्स स्टेशन हैं और अधिक स्थापित किए जा रहे हैं।
  • मॉडल एक्स का वजन 6,000 पाउंड से थोड़ा कम है जो तकनीकी रूप से ब्रुकलिन ब्रिज पर ड्राइव करना अवैध है।
  • 2013 में, टेस्ला मॉडल एस एक ऑल-ग्लास छत के साथ आया था और मस्क ने संकेत दिया है कि भविष्य के मॉडल में एक सौर छत शामिल हो सकती है।
  • टेस्ला कार बनाने में ज्यादा काम करती है। इसने एक "पावर वॉल" भी बनाई जो क्षेत्र में बिजली के आउटेज होने पर द्वितीयक शक्ति स्रोत के रूप में कार्य करती है। यह सौर पैनलों द्वारा चार्ज होता है और 7 से अधिक दिनों तक चल सकता है।
  • 2016 में केवल 76,230 वाहन देने के बावजूद, टेस्ला मोटर्स ने हुंडई, निसान, फोर्ड और जनरल मोटर्स को पीछे छोड़ते हुए अविश्वसनीय बाजार मूल्य प्राप्त किया है।
  • टेस्ला मॉडल एस मोटर ट्रेंड कार ऑफ द ईयर अवार्ड पाने वाली पहली इलेक्ट्रिक कार थी।
  • टेस्ला मोटर्स ने एक वाहन के अंदर सबसे बड़ा टच स्क्रीन और इंटरफ़ेस पैनल बनाया है, जिसकी माप 17 इंच है। डैशबोर्ड स्पीडोमीटर भी एक डिजिटल स्क्रीन है।

विश्व की सबसे महंगी धातु कौनसी है?

ये हैं दुनिया की सबसे महंगी वस्तु, 1 ग्राम की कीमत लाखों करोड़ में

जब दुनिया की सबसे महंगी वस्तु की बात होती है तो आमतौर पर हीरा का नाम दिमाग में आता है। लेकिन कई चीजें हीरे से भी महंगी हैं। उनमें से एंटी मैटर, कैलिफॉर्नियम आदि कुछ हैं। एंटी मैटर के एक ग्राम की कीमत इतनी है जिसे बेचकर 100 छोटे देशों को खरीदा जा सकता है। आइए आज आपको दुनिया की सबसे महंगी वस्तुओं के बारे में बताते हैं...



​एंटिमैटर

एक ग्राम की कीमत: करीब 62.5 ट्रिलियन डॉलर (करीब 43 लाख अरब रुपये)

अब तक एंटिमैटर दुनिया की सबसे महंगी वस्तु है। बिंग बैंग के बाद पदार्थ के साथ ही एंटी मैटर का भी निर्माण हुआ था लेकिन ब्रह्मांड में यह दुर्लभ है। वैज्ञानिक अब तक इसका पता नहीं लगा पाए हैं कि एंटी मैटर क्यों दुर्लभ है। प्रयोगशालाओं में बहुत ही कम मात्रा में इसे तैयार किया गया है। इसका इस्तेमाल भविष्य में ग्रहों की यात्रा में स्पेसशिप में ईंधन के तौर पर इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

कैलिफॉर्नियम

एक ग्राम की कीमत: 1 करोड़ से 2.7 करोड़ डॉलर तक (करीब साढे 7 करोड़ से लेकर 19 करोड़ )

इसकी खोज 1950 में अमेरिका के कैलिफॉर्निया में हुई थी। इसका इस्तेमाल न्यूक्लियर रिएक्टर में किया जाता है। कैलिफोरियम-252 का इस्तेमाल सर्वाईकल कैंसर के इलाज में भी होता है।



​हीरा

एक ग्राम की कीमत: 55,000 डॉलर से लेकर 1,08,000 डॉलर तक (सवा 38 लाख से लेकर करीब सवा 75 लाख रुपये तक)

हीरे के आभूषण लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है। दुनिया की सबसे महंगी वस्तुओं में से हीरा एक ऐसी वस्तु है जिसके बारे में लगभग हर कोई जानता है। बाकी दुर्लभ वस्तुओं के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है।



​ट्राइटियम

एक ग्राम की कीमत: 30,000 पाउंड (साढे 26 लाख रुपये)

यह सुपर हेवी हाइड्रोजन है। कुछ नाभिकीय हथियारों में ईंधन के अहम घटक के तौर पर इसका इस्तेमाल होता है। इसका इस्तेमाल अंधेरे में चमकने वाली घड़ी लाइट के तौर पर होता है। इसका इस्तेमाल मुख्यतः महंगी घड़ियों के निर्माण, दवा और रेडियो थेरपी में किया जाता है। यह हीरे के बाद दुनिया की चौथी सबसे महंगी वस्तुओं में से एक है। ट्राइटियम की खोज 1920 में वाल्टर रसेल ने की थी।

टैफिट स्टोन

एक ग्राम की कीमत: 20,000 डॉलर (करीब 14 लाख रुपये)

यह दुर्लभ रत्न लाल और बैंगनी रंग का होता है। इसका मुख्य स्रोत तंजानिया में है। यह इतना दुर्लभ है कि अब तक जितने खोजे गए हैं उनको एक प्याली में रखा जाए तो सिर्फ आधी प्याली भरेगी। यह हीरा के मुकाबले मुलायम होता है और सिर्फ रत्न के तौर पर इसका इस्तेमाल होता है।

​सॉलिरिस

एक ग्राम की कीमत: 13,880 डॉलर (करीब साढ़े 9 लाख रुपये)

इसे दुनिया की सबसे कीमती ड्रग माना जाता है। इसे दुर्लभ और जिंदगी को खतरा पैदा करने वाली बीमारी atypic Haemolytictic Uraemic Syndrome के उपचार में किया जाता है। इस बीमारी में लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला होता है और इंसान की जिंदगी खतरे में पड़ जाती है।

ग्रैंडिडिएराइट

एक ग्राम की कीमत: घटिया क्वॉलिटी की कीमत करीब 10,000 डॉलर (करीब 7 लाख रुपये)

यह काफी दुर्लभतम खनिज और रत्न है। 1902 में फ्रांस के खोजकर्ता अल्फ्रेड ग्रैंडिडियर मैडागास्कर के प्राकृतिक इतिहास का अध्ययन कर रहे थे। उसी दौरान मैडागास्कर के दक्षिणी भाग में उन्होंने इसकी खोज की।

पेनाइट

एक ग्राम की कीमत: 9,000 से 3,00,000 डॉलर तक (साढ़े 6 लाख से 20 करोड़ रुपये तक)

पेनाइट पत्थर की सामान्य कीमत 9 हजार डॉलर यानी साढ़े 6 लाख रुपये तक है। दुनिया के सभी दुर्लभ खनिजों में पेनाइट अब तक का सबसे कड़ा रत्न है। 1950 में बर्मा के इंग्लैंड के रत्न व्यापारी आर्थर सी.डी.पेन ने इसकी खोज की थी। हाल ही में म्यांमार के मोगोक क्षेत्र में भी इसकी खोज की गई है। काफी महंगे होने के बाद इसकी काफी मांग है।

​प्लुटोनियम

एक ग्राम की कीमत: करीब 6,000 डॉलर (करीब सवा 4 लाख रुपये)

यूरेनियम के नाभिकीय कचरे से इसे प्राप्त किया जा सकता है। प्रकृति में भी यह पाया जाता है लेकिन बहुत दुर्लभ है। इसका आविष्कार 1940 में परमाणु बम तैयार करने के दौरान कैलिफॉर्निया यूनिवर्सिटी की प्रयोगशालाओं में हुआ था। नाभिकीय रिएक्टर में इसे ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।